दर्पण
यहां पर मैं अपनी कविता “दर्पण” का कुछ भाग ही मुद्रित कर रहा हूं|
चेहरे तो नकाबपोश होते हैं ,
सौ रंग बदलते हैं ।
होठों पर जो शब्द उकरे हैं,
रूह का नक्शा ब्यान करते हैं।
………….
…… परम लौ
February 11 2008 04:10 am | कविताऍं and मेरी अपनी
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यदि आपने येह् ब्लाग पढा और आपको ईस ब्लाग में व्याप्त आधियात्मिक शक्ति का |