गाय हमारी माता है तो बैल… भाग २
गाय हमारी माता है तो बैल… भाग २
आज बहुत दिनो बाद समय निकाल पाया, देव वानी मुद्रित करने के लिए| दिवाली “दिपावली” पर्व के कारण और मैं अपना वैब आफिस सैटअप कर रहा था | ईस बार अखबारॉं ने छापा कि ईस बार की दिवाली, पिछले साल के मुकाबले शांत और सवच्छ रही| साथ ही अंग्रेजी के अखबार ने खबर छापी कि ईस दिवाली की रात १२५ पठाकों की दुर्घटनाएं हुई| दोनो समाचारों की विरोधाभास वाली खबरें पढ कर हंसी भी आई| पिछले वर्षों के मुकाबले फर्क सिर्फ ईतना था कि ईस बार मूर्खों ने केवल दिपावली के दिन ही प्रदूशण फैलाया| जबकि पहिले लोग दिपावली से सप्ताह भर पहिले ही पठाके फोडने लगते थे| मैं सोच रहा था कि वह कौन सी घटना रही होगी कि दिपावली पर पठाके फोडने का चलन चल पढा? ऐसे बारूदी धुंऐं में राम जी तो क्या आऐंगे और मां लक्ष्मी भी कदापि ना आएंगी| जब मैं लोगों को बडे बडे पठाके फोडता देखता हू तो कहिता हूं कि लगता है ये लोग बारुदी धमाके करके और बदबू फैला कर घोषणा कर रहे कि कोई देवी देवता उनके घर प्रवेश ना करें| बस मुर्खता है और क्या……
अभी बीच में जो कुछ भी हालात पैदा हुए उसे देखकर मन थोडा विचलित हुआ और फिर से जनतंत्र की नपुंसकता के साक्षी बनना पडा| लगता है किसी दिन भारत में मराठी भाषा आंतकी वीचारधारा की परिचायक हो जाएगी| यदि जनत्तांत्रिक सरकार में शासन करने की समझ होती तो, राज ठाकारे को उपद्रवी घोषित कर देश निकाला दे देना चाहिए था ताकि वह कुछ समय विचार ध्यान कर सके और उसकी मानसिक स्थिति में उथान हो सके| राज ठाकरे को सोचना चहिए के वह मुम्बई में अंतक पैलाने के दुश कर्म को छोड कर आंत्रिक महाराष्ट्रा के लिए क्या भला कर सकता है| हर सोच दो द्वारों की कुंजी होती है एक सदगति की ओर और दूसरा दुरगति की और ले जाता है| प्रतेक व्यक्ति अपनी मानसिक बुद्धी के बल से या तो संभल जाता है या फिर फिसल जाता है और दुरगति के कारण दुख को प्राप्त करता है| और यदि वह व्यक्ति किसी समुदाय, संप्रदा या संगठन का नेता हो तो, वह सभी के सामुहिक उत्थान या पतन का कारण हो जाता है|…….शेष आगे
October 30 2008 01:09 pm | जीवन and समाचार and समाज



