धरती फट गईल बा और आग धुआं निकल ने लग गईल|
“धरती फट गईल बा और आग और धुआं निकलने लग गईल|” यह खबर थी महुआ टीवी चैनल पर| खबर थी कि पश्चमी बंगाल राज्य में कई देहाती ईलाकों में दहशत का माहोल है| कई जगह धरती में बडी बडी द्रारें पढ गई हैं और उस में से आग और धुआं निकल रहा है| साथ ही पत्रकार ने बताया कि ईसका मूल कारण ईलाके में चल रही अवैद्ध खन्न है| स्थानिय लोग अवैद्ध रुप से कोयला का खन्न कर रहे हैं| कभी कभी तो यह सब, कभी ना स्माप्त होने वाला पगलपन प्रतीत होता है| एक वो कलीदास की कहानी थी जिसे सुनकर लोगों में प्रहास करने की बौद्धिक क्षमता थी| पर आज कल तो सभी वही मुर्खता करने में जुटे हैं| प्रसिद्ध लेखक खुशवंत सिंघ (पागल की डाईरी वाले), भजन करने की उमर में कामसुत्रा पढ रहे हैं| चलो ईतना तो है कि उन्हे यह सब मुर्खतापूर्ण लगा वर्ना वे भी निशब्द् होने को त्यार हो जाते| मुझे तो उस मुद्रक (प्रकाशक) पर हंसी आई कि क्या सोच कर उसने कामसुत्र की पुस्तक एक व्रद्ध को नये साल की भेंट के रूप में दे दी| कहां भटक गये….
हां तो बात हो रही थी पागलपन की| एक प्रकार का पागलपन तो वह है जो दिमाग के घटकों के असंतुलन के कारण होता है| जिसका ईलाज शरीरिक चिक्तिसा से किया जाता है| और दूसरे प्रकार का पागलपन मानसिक तो होता ही है पर उसका उपचार शैक्षणिक प्रणाली से संभव होता है| तो ये तो थी पागलपन की दो मुख्य क्ष्रेणीयां….
January 22 2009 07:25 pm | जीवन and धरती and भारत and समाचार and समाज and हंसी मजाक


