शायद् नाथ शरन में मिले स्थान
हे क्रिष्ण सेवक,
अभी मैं ईतना उध्दगम नहि हुआ
कि आश्रय श्री क्रिष्ण प्रेम क मागं सकूं
मैं तो मागूं शरण प्रभु की,
चहून् चरन् शपर्ष प्रभु के,
अब तो वो भी नहि मिले,
हे सेवक! मुझे याद करो,
हे सेवक! मेर नाम् पुकरो,
शायद् नाथ शरन में मिले स्थान
……………………….
…………. परम लौ
February 04 2008 10:43 am | आस्था and कविताऍं and मेरी अपनी



