देव वानी » कविताऍं
देव वानी

यदि आपने येह् ब्लाग पढा और आपको ईस ब्लाग में व्याप्त आधियात्मिक शक्ति का
आभास भी हुआ, तो आपने दोस्तों को अवश्य बतलाऐं।
अपने दोस्तों और साथीयों को बताने के लिए     यहां कल्कि करें।
क्योंकि ग्यान को अपने तक सिमित रखना भी एक अपराध है।

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Archive for the 'कविताऍं' Category

जय बोलो श्रीनाथ की !! प्रभु की स्तुति

जय बोलो श्रीनाथ की !!

मन ने प्रभु की स्तुति की और वह कविता का रूप ले कर अक्षरों में गड़ गई| यदि आप लोगों में कोई माँ सरस्वती की कृपा से गायक हो तो आप इस सतुति को सुरों से आलंकृत कर सकते हैं| continue reading »

July 13 2008 | अनमोल वचन and आस्था and कविताऍं and मेरी अपनी | No Comments »

Protected: जय बोलो श्रीनाथ की !!

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July 09 2008 | अनमोल वचन and आस्था and कविताऍं and जीवन and भारत and मेरी अपनी | Enter your password to view comments

कैसे पाऊं प्यारे घनश्याम को !!

Shiri Krishna

भगवान से प्यार करना आसान है,
पर भगवान के प्यार को सहन करना आसान नही। continue reading »

May 21 2008 | आस्था and कविताऍं and जीवन and मेरी अपनी | No Comments »

“प्यारा सा लम्हा”


मेरी अपनी कविता “प्यारा सा लम्हा” मेरी पसंन्दिदा कविता भी है। यहॉं मैं ईस कविता का एक भाग ही मुद्रित् (प्रकाशित्) कर रह हूँ। यह् कविता मैने सन 1999 के अक्तुबर मास् में लिखी थी।


यदि आप ईस कविता को कहीं प्रकशित् करना चाहते हैं तो क्रिप्या मुझे सप्रंक करके मेरी स्वीकारीता प्राप्त् करें। यह बौद्धिक संपति के अधिकार् के अन्तरगत् अनिवार्य है।

!! प्यारा सा लम्हा !!
………………………..Oct 8th, 1999

आज दिल की गहराईयों से,
मन की उमंगो तक,
कोई नाम ढूंढ रहा हूँ,
ईक पहिचान ढूंढ रहा हूँ,
ईक प्यारा सा लम्हा बुन रहा हूँ।

………….. continue reading »

May 19 2008 | कविताऍं and जीवन and मेरी अपनी | No Comments »

श्री राम का ह्र्दय

!! श्री राम !!

श्री राम नाम से मिले सुख,
श्री राम नाम से मिले आराम,
श्री राम नाम से मिले शान्ति,
श्री राम नाम से मिटे संताप|

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May 19 2008 | अनमोल वचन and आस्था and कविताऍं and मेरी अपनी | 1 Comment »

दर्पण

यहां पर मैं अपनी कविता “दर्पण” का कुछ भाग ही मुद्रित कर रहा हूं|

चेहरे तो नकाबपोश होते हैं , continue reading »

February 11 2008 | कविताऍं and मेरी अपनी | No Comments »

शायद् नाथ शरन में मिले स्थान

हे क्रिष्ण सेवक,
अभी मैं ईतना उध्दगम नहि हुआ
कि आश्रय श्री क्रिष्ण प्रेम क मागं सकूं
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February 04 2008 | आस्था and कविताऍं and मेरी अपनी | No Comments »

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